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Agyeya
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भिक्षुक
Suryakant Tripathi 'Nirala'
The searing image of a beggar staggering along the road.
बीती विभावरी जाग री
Jaishankar Prasad
The dawn call — a landmark Chhayavaad lyric.
समर शेष है
Ramdhari Singh Dinkar
The battle is not over — Dinkar's poem to the citizens of independent India.
कवितावली
Tulsidas
Tulsidas's celebration of Ram from Kavitavali.
इस पार, उस पार
Harivansh Rai Bachchan
है अंधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है! कल्पना के हाथ से कमनीय जो मंदिर बना था, भावना के हाथ से जिसमें सुरभि का दीप जलता था, स्वप्न ने अपने करों से था जिसे रुचि से सँवारा, वह अभी दो पल न बीते और झोंके
जो तुम आ जाते एक बार
Mahadevi Verma
जो तुम आ जाते एक बार, कितनी करुणा कितने संदेश, पथ में बिछ जाते बन पराग, गाता प्राणों का तार-तार, अनुरागी मन अनुरागमयी होकर आती जो तुम आ जाते एक बार॥
मैं नीर भरी दुख की बदली
Mahadevi Verma
Mahadevi's iconic identification of the self with a raincloud full of sorrow.
विपदा
Mahadevi Verma
कौन तुम मेरे हृदय में? कौन मेरी शून्यता के अंतरिक्ष में गूँज सा जो घुल गया है? कौन प्रति-पग-चिह्न सा मेरे लिए गंतव्य के मग पर बिछा है?
कामायनी — चिन्ता सर्ग
Jaishankar Prasad
The opening of Manu's brooding after the great flood — the most celebrated modern Hindi epic.
आँसू
Jaishankar Prasad
जो घनीभूत पीड़ा थी, मस्तक में स्मृति सी छायी, दुर्दिन में आँसू बनकर, वह आज बरसने आयी।
भारत माता
Sumitranandan Pant
Pant's tender portrait of Mother India as a village woman.
हिमालय
Ramdhari Singh Dinkar
मेरे नगपति! मेरे विशाल! साकार, दिव्य, गौरव विराट, पौरुष के पुंजीभूत ज्वाल, मेरी जननी के हिम-किरीट, मेरे भारत के दिव्य भाल।
विनय पत्रिका
Tulsidas
श्रीराम! राम! रघुनाथ ! भजु मन, राम ! राम! श्रीराम॥ इहै राम को नाम मंत्र निबहै, सब सिद्धि करै विश्राम॥
अग्निपथ
Harivansh Rai Bachchan
The soul-stirring call to persist on the path of fire — one of the most quoted poems of modern Hindi.
तोड़ती पत्थर
Suryakant Tripathi 'Nirala'
The searing image of a woman breaking stones on an Allahabad road — a milestone of progressive Hindi poetry.
कुरुक्षेत्र
Ramdhari Singh Dinkar
क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो, उसको क्या जो दन्तहीन, विषरहित, विनीत, सरल हो। सहनशीलता, क्षमा, दया को, तभी पूजता जग है, बल का दर्प चमकता उसके, पीछे जब जगमग है।
नदी के द्वीप
Agyeya
The metaphor of islands in the river — self-reliant yet part of the whole.
अँधेरे में
Muktibodh
The opening lines of Muktibodh's monumental long poem — a nightmarish quest for the ideal self.
एक अजनबी से भेंट
Kunwar Narayan
कोई तो होगा जो हमको भी ढूँढ रहा होगा, कोई तो होगा जिसकी हम भी ज़रूरत होंगे।
भारत-भारती
Maithili Sharan Gupt
The awakening call to India — the poem that earned Gupt the title of Rashtrakavi.
कारवाँ गुज़र गया
Gopaldas Neeraj
The wistful lament — a bejewelled masterpiece by Neeraj.
अकाल और उसके बाद
Nagarjun
The famine and after — Nagarjun's compact masterpiece of hunger.
नदी
Kedarnath Singh
अगर धीरे चलो, वह तुम्हें छू लेगी, अगर दौड़ो, तो पीछे छूट जाएगी। अगर पीठ फेरो, तो पुकारेगी, अगर मुड़ के देखो, तो कुछ नहीं कहेगी।
मधुशाला
Harivansh Rai Bachchan
Selected quatrains from Bachchan's iconic work — a metaphysical meditation using the imagery of the tavern.
रश्मिरथी — तृतीय सर्ग
Ramdhari Singh Dinkar
The thundering verses where Krishna warns Duryodhana — from Dinkar's epic on Karna.
Amir Khusro
छाप तिलक सब छीनीछाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके। प्रेम भटी का मदवा पिलाइके, मतवारी कर लीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके। गोरी गोरी बइयाँ, हरी हरी चूड़ियाँ,
Meera Bai
पायो जी मैंनेपायो जी मैंने राम रतन धन पायो। वस्तु अमोलिक दी मेरे सतगुरु, किरपा कर अपनायो। जनम-जनम की पूँजी पाई, जग में सभी खोवायो। खरचै नहिं कोई चोर न लेवे, दिन दिन
Suryakant Tripathi 'Nirala'
सरोज-स्मृतिदुःख ही जीवन की कथा रही, क्या कहूँ आज, जो नहीं कही! हो इसी कर्म पर वज्रपात, यदि धर्म, रहे नत मात्र माथ, जिससे हारे सब जीव-जात, वह मृत्यु, अरे तेर
Mahadevi Verma
मैं नीर भरी दुख की बदलीमैं नीर भरी दुख की बदली! स्पन्दन में चिर निस्पन्द बसा, क्रन्दन में आहत विश्व हँसा, नयनों में दीपक से जलते, पलकों में निर्झरिणी मचली!
Tulsidas
श्रीरामचरितमानस – बालकांडमंगल भवन अमंगल हारी। द्रवउ सो दसरथ अजिर बिहारी।। सब कर मत खगनायक एहा। करिय राम पद पंकज नेहा।। राम भगति
Kabir
कबीर के दोहेबुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय। जो मन खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।। पानी केरा बुदबुदा, अस मानुस की जात। देखत ही छिप
Ramdhari Singh Dinkar
रश्मिरथी – प्रथम सर्गजय हो! जग में जगमग जगमग, जय हो जीवन ज्योतिर्मय! मानवता के महामेरु हे, तेरी जय हो, तेरी जय! यह जीवन क्या है? निर्झर है, मस्ती ही इसका पानी है, स
Subhadra Kumari Chauhan
झांसी की रानीसिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी, बूढ़े भारत में भी आई फिर से नयी जवानी थी, गुमी हुई आज़ादी की क़ीमत सबने पहचानी थी, दूर फिरंगी को करने की सब
Harivansh Rai Bachchan
मधुशालामृदु भावों के अंगूरों की आज बना लाया हाला, प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला, पहले भोग लगा लूँ तुझको फिर प्रसाद जग पाएगा, सबसे पहले तेरा स्वागत कर
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