poem · 1935

Madhushala (Selection)

मधुशाला

Harivansh Rai Bachchan· Nayi Kavita

Selected quatrains from Bachchan's iconic work — a metaphysical meditation using the imagery of the tavern.

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मृदु भावों के अंगूरों की आज बना लाया हाला, प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला, पहले भोग लगा लूँ तुझको फिर प्रसाद जग पाएगा, सबसे पहले तेरा स्वागत करती मेरी मधुशाला॥ बने पुजारी प्रेमी साक़ी, गंगा जल पावन हाला, रहे फेरता अविरत गति से मधु के प्यालों की माला, और लिये जा, और पीये जा, इसी मंत्र का जाप करे— 'मैं शिव की, शिव मेरे हैं', यह अद्वैत है मधुशाला॥
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