है अंधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है!
कल्पना के हाथ से कमनीय जो मंदिर बना था,
भावना के हाथ से जिसमें सुरभि का दीप जलता था,
स्वप्न ने अपने करों से था जिसे रुचि से सँवारा,
वह अभी दो पल न बीते और झोंके ने बुझाया।
है पवन उन्मन, दीया फिर भी जलाना कब मना है।