poem · 1952

Akal Aur Uske Baad

अकाल और उसके बाद

Nagarjun· Progressive

The famine and after — Nagarjun's compact masterpiece of hunger.

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कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास, कई दिनों तक कानी कुतिया सोयी उनके पास। कई दिनों तक लगी भीत पर, छिपकलियों की गश्त, कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त। दाने आये घर के अन्दर, कई दिनों के बाद, धुआँ उठा आँगन से ऊपर, कई दिनों के बाद। चमक उठी घर भर की आँखें, कई दिनों के बाद, कौवे ने खुजलायी पाँखें, कई दिनों के बाद॥
#progressive

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