novel · 1936

Godaan (Opening)

गोदान

Munshi Premchand· Realism

The opening of Premchand's magnum opus depicting the tragedy of the Indian peasant.

19 reads 0 likes 1 min
होरी ने दोनों बैलों को पानी पिला, नाँद में चारा डाल, पत्नी धनिया से बोला—गोबर को कहाँ भेजा है? मैं तो अब घर से नहीं जा सकता, नहलाना है। जरा उसे बुला ले, तो चला जाऊँ। धनिया के हाथ इस समय गोबर से भरे थे। उपले पाथकर आ रही थी। बोली—अब आते ही होंगे। तुम जाकर नहा-धो लो। ऐसा कौन-सा राज-काज है जो अभी किए बिना काम नहीं चलेगा।
#novel#godaan#realism

Reader Reviews

0.0(0 reviews)