ज़ीहाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल, दुराय नैना बनाय बतियाँ।
कि ताब-ए-हिज्राँ नदारम ऐ जाँ, न लेहो काहे लगाय छतियाँ।
शबान-ए-हिज्राँ दराज़ चूँ ज़ुल्फ़, वो रोज़-ए-वस्लत चो उम्र कोताह।
सखी पिया को जो मैं न देखूँ, तो कैसे काटूँ अँधेरी रतियाँ॥
A polyglot ghazal alternating Persian and Braj Bhasha — perhaps the first macaronic verse in India.