कहलाने एकत बसत अहि मयूर मृग बाघ। जगत तपोवन सो कियो दीरघ दाघ निदाघ॥ नहिं पराग नहिं मधुर मधु नहिं विकास इहिं काल। अली कली ही सों बंध्यो आगे कौन हवाल॥