story · 1930

Poos Ki Raat (Excerpt)

पूस की रात

Munshi Premchand· Realism

The heart-breaking tale of Halku, a poor farmer who cannot buy a blanket for the freezing December night.

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हल्कू ने आकर स्त्री से कहा—सहना आया है, लाओ, जो रुपये रखे हैं, उसे दे दूँ, गला तो छूटे। मुन्नी झाड़ू लगा रही थी। पीछे फिरकर बोली—तीन ही तो रुपये हैं, दे दोगे तो कम्बल कहाँ से आवेगा? माघ-पूस की रात कैसे कटेगी? उससे कह दो, फ़सल पर दे देंगे, अभी नहीं। हल्कू एक क्षण अनिश्चित भाव से खड़ा रहा। पूस सिर पर आ रहा था, कम्बल के बिना वह खेत पर सो न सकेगा।
#story#realism#premchand

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