पूस की रात
हल्कू ने आकर स्त्री से कहा—सहना आया है। जो कुछ रुपये-पैसे रखे हैं, ला के दे दूँ; गला तो छूटे। मुन्नी झाड़ू लगा रही थी। पीछे फिर कर बोली—तीन ही तो रुपये हैं, दे दोगे तो कम्बल कहाँ से आएगा? माघ-पूस की रात कैसे कटेगी? उससे कह दो, फ़सल पर दे देंगे, अभी नहीं।
हल्कू एक क्षण अनिश्चित भाव से खड़ा रहा। पूस सिर पर आ रहा है, कम्बल के बग़ैर रात को खेत पर सोना मुश्किल है।
[Excerpt from Premchand's 'Poos Ki Raat' — a poignant tale of poverty and human dignity. Public domain.]