story · 1933

Idgah (Excerpt)

ईदगाह

Munshi Premchand· Realism

The touching story of a poor orphan boy Hamid who chooses to buy iron tongs for his grandmother instead of toys at the Eid fair.

2 reads 0 likes 1 min
रमज़ान के पूरे तीस रोज़ों के बाद ईद आयी है। कितनी मनोहर, कितनी सुहावनी प्रभात है! वृक्षों पर अजीब हरियाली है, खेतों में कुछ अजीब रौनक है, आसमान पर कुछ अजीब लालिमा है! हामिद खुशी से उछल रहा था। वह तीन-चार साल का दुबला-पतला लड़का था। सर पर एक पुरानी टोपी थी, पैरों में जूते नहीं थे, फिर भी वह प्रसन्न था। उसे मालूम था कि अब्बाजान रुपये कमाने गए हैं और अम्मीजान अल्लाह के घर से बहुत-सी अच्छी चीज़ें लाने। इसलिए वह उदास क्यों हो!
#story#hindi-literature#realism

Reader Reviews

0.0(0 reviews)