Zeehal-e-Miskin ज़ीहाल-ए-मिस्कीन — Amir Khusro (1300) ---------------------------------------- ज़ीहाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल, दुराय नैना बनाय बतियाँ। कि ताब-ए-हिज्राँ नदारम ऐ जाँ, न लेहो काहे लगाय छतियाँ। शबान-ए-हिज्राँ दराज़ चूँ ज़ुल्फ़, वो रोज़-ए-वस्लत चो उम्र कोताह। सखी पिया को जो मैं न देखूँ, तो कैसे काटूँ अँधेरी रतियाँ॥ ---------------------------------------- Source: Kavyalekh — kavyalekh.com Public domain work