Akal Aur Uske Baad अकाल और उसके बाद — Nagarjun (1952) ---------------------------------------- कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास, कई दिनों तक कानी कुतिया सोयी उनके पास। कई दिनों तक लगी भीत पर, छिपकलियों की गश्त, कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त। दाने आये घर के अन्दर, कई दिनों के बाद, धुआँ उठा आँगन से ऊपर, कई दिनों के बाद। चमक उठी घर भर की आँखें, कई दिनों के बाद, कौवे ने खुजलायी पाँखें, कई दिनों के बाद॥ ---------------------------------------- Source: Kavyalekh — kavyalekh.com Public domain work