Karvaan Guzar Gaya कारवाँ गुज़र गया — Gopaldas Neeraj (1970) ---------------------------------------- स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से, लुट गए सिंगार सभी बाग़ के बबूल से, और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे। कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे॥ ---------------------------------------- Source: Kavyalekh — kavyalekh.com Public domain work