Bhikshuk भिक्षुक — Suryakant Tripathi 'Nirala' (1932) ---------------------------------------- वह आता— दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता। पेट-पीठ दोनों मिलकर हैं एक, चल रहा लकुटिया टेक, मुट्ठी-भर दाने को — भूख मिटाने को मुँह फटी-पुरानी झोली को फैलाता॥ ---------------------------------------- Source: Kavyalekh — kavyalekh.com Public domain work