Kurukshetra (Excerpt) कुरुक्षेत्र — Ramdhari Singh Dinkar (1946) ---------------------------------------- क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो, उसको क्या जो दन्तहीन, विषरहित, विनीत, सरल हो। सहनशीलता, क्षमा, दया को, तभी पूजता जग है, बल का दर्प चमकता उसके, पीछे जब जगमग है। ---------------------------------------- Source: Kavyalekh — kavyalekh.com Public domain work