Andhere Mein (Opening) अँधेरे में — Muktibodh (1964) ---------------------------------------- ज़िन्दगी के... कमरों में अँधेरे, लगाता है चक्कर कोई एक लगातार; आवाज़ पैरों की देती है सुनाई बार-बार... बार-बार... वह नहीं दिखाई देता, किन्तु, मुझे लगातार, महसूस होता है कि पीछे-पीछे मेरे, गहन-अँधेरी खोहों-सी आँखोंवाला, लंबी-दढ़ियलवाला, दुबला-सा लंबा-सा कोई एक चलता है, ठहरता है। ---------------------------------------- Source: Kavyalekh — kavyalekh.com Public domain work