Idgah (Excerpt) ईदगाह — Munshi Premchand (1933) ---------------------------------------- रमज़ान के पूरे तीस रोज़ों के बाद ईद आयी है। कितनी मनोहर, कितनी सुहावनी प्रभात है! वृक्षों पर अजीब हरियाली है, खेतों में कुछ अजीब रौनक है, आसमान पर कुछ अजीब लालिमा है! हामिद खुशी से उछल रहा था। वह तीन-चार साल का दुबला-पतला लड़का था। सर पर एक पुरानी टोपी थी, पैरों में जूते नहीं थे, फिर भी वह प्रसन्न था। उसे मालूम था कि अब्बाजान रुपये कमाने गए हैं और अम्मीजान अल्लाह के घर से बहुत-सी अच्छी चीज़ें लाने। इसलिए वह उदास क्यों हो! ---------------------------------------- Source: Kavyalekh — kavyalekh.com Public domain work