Rashmirathi (Prasang Ek) — Ramdhari Singh Dinkar (1952) ---------------------------------------- रश्मिरथी – प्रथम सर्गजय हो! जग में जगमग जगमग, जय हो जीवन ज्योतिर्मय! मानवता के महामेरु हे, तेरी जय हो, तेरी जय! यह जीवन क्या है? निर्झर है, मस्ती ही इसका पानी है, सुख-दुख के दोनों तीरों से बहता चलता निर्भर है। क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो, उसको क्या जो दन्तहीन, विषरहित, विनीत, सरल हो। [Excerpt from Dinkar's epic 'Rashmirathi' on Karna. Public domain in India.] ---------------------------------------- Source: Kavyalekh — kavyalekh.com Public domain work