Todti Patthar तोड़ती पत्थर — Suryakant Tripathi 'Nirala' (1935) ---------------------------------------- वह तोड़ती पत्थर; देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर— वह तोड़ती पत्थर। कोई न छायादार पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार; श्याम तन, भर बंधा यौवन, नत नयन, प्रिय-कर्म-रत मन, गुरु हथौड़ा हाथ, करती बार-बार प्रहार— सामने तरु-मालिका अट्टालिका, प्राकार। ---------------------------------------- Source: Kavyalekh — kavyalekh.com Public domain work