Idgah — Munshi Premchand (1933) ---------------------------------------- ईदगाहरमज़ान के पूरे तीस रोज़ों के बाद ईद आयी है। कितना मनोहर, कितना सुहावना प्रभात है। पेड़ों पर अजीब हरियाली है, खेतों में कुछ अजीब रौनक है, आसमान पर कुछ अजीब लालिमा है। आज का सूर्य देखो, कितना प्यारा, कितना शीतल है, मानो संसार को ईद की बधाई दे रहा है।गाँव में कितनी हलचल है। ईदगाह जाने की तैयारियाँ हो रही हैं। किसी के कुरते में बटन नहीं है, पड़ोस के घर सुई-धागा लेने दौड़ा जा रहा है। किसी के जूते कड़े हो गए हैं, उनमें तेल डालने के लिए तेली के घर पर भागा जा रहा है।[This is an excerpt of Premchand's classic short story 'Idgah' about a young boy Hamid who buys a pair of tongs for his grandmother instead of toys for himself. Public domain.] ---------------------------------------- Source: Kavyalekh — kavyalekh.com Public domain work