Main Neer Bhari Dukh Ki Badli मैं नीर भरी दुख की बदली — Mahadevi Verma (1936) ---------------------------------------- मैं नीर भरी दुख की बदली! स्पन्दन में चिर निस्पन्द बसा, क्रन्दन में आहत विश्व हँसा, नयनों में दीपक-से जलते, पलकों में निर्झरणी मचली। मैं नीर भरी दुख की बदली! ---------------------------------------- Source: Kavyalekh — kavyalekh.com Public domain work