Boodhi Kaki (Excerpt) बूढ़ी काकी — Munshi Premchand (1921) ---------------------------------------- बुढ़ापे में मनुष्य फिर बालक बन जाता है। बूढ़ी काकी में जिह्वा-स्वाद के सिवा और कोई इच्छा शेष न थी। बच्चों की तरह वह भी दिन भर अन्न के लिए तड़पती रहतीं। सारी बात यह थी कि अब उन्हें अपने कमरे से बाहर जाने की सामर्थ्य न थी। ---------------------------------------- Source: Kavyalekh — kavyalekh.com Public domain work