Beeti Vibhavari Jaag Ri बीती विभावरी जाग री — Jaishankar Prasad (1935) ---------------------------------------- बीती विभावरी जाग री! अम्बर-पनघट में डुबो रही तारा-घट ऊषा-नागरी। खग-कुल कुल-कुल-सा बोल रहा, किसलय का अंचल डोल रहा, लो यह लतिका भी भर लाई मधु मुकुल नवल रस गागरी। ---------------------------------------- Source: Kavyalekh — kavyalekh.com Public domain work